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सावन थे तुम




मेरे तो, सावन थे तुम,

बिन बादल बरसात किए बहार जो लाते थे,


मेरे तो, यौवन थे तुम,

 पावन पुष्प पुलकित कर पल में, फुहार जो लाते थे,


मेरे तो, मनभावन थे तुम,

 परम प्रेम प्रमाणित किए बिन जो प्यार जताते थे,


मेरे तो, आँगन थे तुम,

तेज़ तरुण तुलसी से जो घर-बार सजाते थे,


मेरे तो, माधव थे तुम,

रात्रि रोज राधा रानी संग जो रास रचाते थे,


मेरे तो, प्रारभ थे तुम,

निर्मल निश्छल निरूपण मन के पास जो लाते थे,


मेरे तो, अंजन थे तुम,

नव नयन नभ अयन से बहकर जो निबंध बन जाते थे।

 

तेरे तो, मनोरंजन थे हम,

अमुक अज्ञात अविरल अज्ञान के अश्रु से अंजुली भर आते थे।




-मनीष कुमार टिंकू 

 





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मतलब

दो आंखें बोल रहीं हैं सब, सौ दरिया खोल रहीं हैं अब, जब गरीबी दिखा रही हो करतब, फिर दही जलेबी का क्या मतलब? जब रोटी कपड़ा ही हो मज़हब, फिर मंदिर मस्ज़िद का क्या मतलब? जब दो वक्त की रोटी न हो साहब, फिर हीरे मोती का क्या मतलब? जब चैन सुकून ही हो गायब, फिर ईश्क-जुनून का क्या मतलब? - मनीष कुमार टिंकू 

हे पार्थ

हे पार्थ अब रुक मत  उठा शीश अब झुक मत  अतुल्य कला मत रख अंदर, तू पृथापुत्र तेरे पिता पुरंदर। है चट्टानों सा तेरा सीना, बाणों के वेग को तूने छीना। गाण्डीव का आवाहन करना, है उनसे पहले तुझे खुद से लड़ना। क्यूँ समझे तू उसे संबंधी? अधर्मी से किया जो संधि वो तेज प्रतापी महापुरुष थे? जो रोक सके न रण पौरुष से। मत कह बंधु अपने दुश्मन को, जो टोक सके न दुस्साशन को, जब पांचाली का उसने चीर हरा, देख रहा था समस्त सभा बस मूक खड़ा। उस सभा में तेरे गुरुजन भी थे, दुष्ट दुस्साशन और दुर्योधन भी थे, महाज्ञानी गुरु द्रोण भी थे, कुछ बोले न वो मौन ही थे।  वहीं सभा में थे भीष्म पितामह    जिनके   मुख से निकला ना आह, जब पौत्र-वधु थी विलाप रही माधव का नाम बस जाप रही। क्षण शेष नहीं अब विजय में है, क्या अब भी तू संसय मे है? उ ठा गांडीव कर प्रहार तू अधर्मियों का कर संघार तू  धर्म का रख फिर नीव नया बन कर्मयोगी, तू अब छोड़ दया  क्यों है विकल जब कृष्ण हैं सारथि, कर ले विजय अब कुरु की धरती।                      ...

याद

जख्म दिल में थे, आंखों से बह गए, कुछ अरमान मेरे अधूरे ही रह गए। साथ रहेंगे सदा वो इतना कह गए, पर नसीब के महल पहले ही ढह गए, और यादों के सहारे हम अकेले ही रह गए। अब जब याद ही साथ रह गए हैं तो उन्हे समेट कर रख लेता हूं। अब जब नसीब ही हार गए है, तो उन्हे बदल कर चख लेता हूं। अब जब साथ ही छूट गए हैं, तो उन्हे भूल कर देख लेता हूं। अब जब अरमान ही अधूरे रह गए हैं, तो उन्हे पलट के देख लेता हूं। अब जब दिल के जख्म दिख गए हैं, तो उनके लहू से लिख लेता हूं। -मनीष कुमार टिंकू