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उम्मीदों के फूल






फिर किसी मोड़ पे शायद हम मिलें कभी,

उस मोड़ पे जहाँ मिलते हैं अजनबी सभी। 

उन अधूरी बातों का करूँ ज़िक्र तुमसे,

जो घंटों बैठ किया था बेफ़िक्र तुमसे। 

कुछ रह गया था बाकी मुझमें,

क्या वो तुम थी या मेरे अधूरे सपने?

छोड़ गयी थी मुझे अकेला बीच भंवर में 

तेरी खातिर बना हूं छैला , अपनी आँखें मीच सँवर मैं। 



फिर उन बागों में हम साथ चलें,

जहाँ पहली दफ़ा दो हाँथ मिलें।  

उन हांथो को फिर चुम सकूँ,

मजनू बनकर फिर झूम सकूँ।  

फिर कभी ना जाने दूँ तुझको मैं, 

बस तेरा बन जाने दूँ खुद को मैं। 

क्या मेरे बिखरे ख्वाबों को समेट सकोगी फिर?

उम्मीदों के फूल खिलेंगे या बंजर खेत करोगी फिर?


-मनीष कुमार टिंकू 





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मतलब

दो आंखें बोल रहीं हैं सब, सौ दरिया खोल रहीं हैं अब, जब गरीबी दिखा रही हो करतब, फिर दही जलेबी का क्या मतलब? जब रोटी कपड़ा ही हो मज़हब, फिर मंदिर मस्ज़िद का क्या मतलब? जब दो वक्त की रोटी न हो साहब, फिर हीरे मोती का क्या मतलब? जब चैन सुकून ही हो गायब, फिर ईश्क-जुनून का क्या मतलब? - मनीष कुमार टिंकू 

When NobodyHelps

When the brain inside debates  When the storm inside abates When sleepless night assassinates When the past creeps in and investigates When ego surrenders and guilt arrests When memories walk past but time awaits When every thought inside procrastinates When fear dies and tear evaporates When utopia hides behind society's gates When fate says you are not mates When dilemma stays like a mistress When the heart plays in distress When her absence still affects When your dream disconnects When your own love suspects When you lose nerve and frown on your defects When you break down and hurt yourselves When you succumb but nobody helps. -Manish Kumar Tinku