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उम्मीदों के फूल






फिर किसी मोड़ पे शायद हम मिलें कभी,

उस मोड़ पे जहाँ मिलते हैं अजनबी सभी। 

उन अधूरी बातों का करूँ ज़िक्र तुमसे,

जो घंटों बैठ किया था बेफ़िक्र तुमसे। 

कुछ रह गया था बाकी मुझमें,

क्या वो तुम थी या मेरे अधूरे सपने?

छोड़ गयी थी मुझे अकेला बीच भंवर में 

तेरी खातिर बना हूं छैला , अपनी आँखें मीच सँवर मैं। 



फिर उन बागों में हम साथ चलें,

जहाँ पहली दफ़ा दो हाँथ मिलें।  

उन हांथो को फिर चुम सकूँ,

मजनू बनकर फिर झूम सकूँ।  

फिर कभी ना जाने दूँ तुझको मैं, 

बस तेरा बन जाने दूँ खुद को मैं। 

क्या मेरे बिखरे ख्वाबों को समेट सकोगी फिर?

उम्मीदों के फूल खिलेंगे या बंजर खेत करोगी फिर?


-मनीष कुमार टिंकू 





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मतलब

दो आंखें बोल रहीं हैं सब, सौ दरिया खोल रहीं हैं अब, जब गरीबी दिखा रही हो करतब, फिर दही जलेबी का क्या मतलब? जब रोटी कपड़ा ही हो मज़हब, फिर मंदिर मस्ज़िद का क्या मतलब? जब दो वक्त की रोटी न हो साहब, फिर हीरे मोती का क्या मतलब? जब चैन सुकून ही हो गायब, फिर ईश्क-जुनून का क्या मतलब? - मनीष कुमार टिंकू 

हे पार्थ

हे पार्थ अब रुक मत  उठा शीश अब झुक मत  अतुल्य कला मत रख अंदर, तू पृथापुत्र तेरे पिता पुरंदर। है चट्टानों सा तेरा सीना, बाणों के वेग को तूने छीना। गाण्डीव का आवाहन करना, है उनसे पहले तुझे खुद से लड़ना। क्यूँ समझे तू उसे संबंधी? अधर्मी से किया जो संधि वो तेज प्रतापी महापुरुष थे? जो रोक सके न रण पौरुष से। मत कह बंधु अपने दुश्मन को, जो टोक सके न दुस्साशन को, जब पांचाली का उसने चीर हरा, देख रहा था समस्त सभा बस मूक खड़ा। उस सभा में तेरे गुरुजन भी थे, दुष्ट दुस्साशन और दुर्योधन भी थे, महाज्ञानी गुरु द्रोण भी थे, कुछ बोले न वो मौन ही थे।  वहीं सभा में थे भीष्म पितामह    जिनके   मुख से निकला ना आह, जब पौत्र-वधु थी विलाप रही माधव का नाम बस जाप रही। क्षण शेष नहीं अब विजय में है, क्या अब भी तू संसय मे है? उ ठा गांडीव कर प्रहार तू अधर्मियों का कर संघार तू  धर्म का रख फिर नीव नया बन कर्मयोगी, तू अब छोड़ दया  क्यों है विकल जब कृष्ण हैं सारथि, कर ले विजय अब कुरु की धरती।                      ...

याद

जख्म दिल में थे, आंखों से बह गए, कुछ अरमान मेरे अधूरे ही रह गए। साथ रहेंगे सदा वो इतना कह गए, पर नसीब के महल पहले ही ढह गए, और यादों के सहारे हम अकेले ही रह गए। अब जब याद ही साथ रह गए हैं तो उन्हे समेट कर रख लेता हूं। अब जब नसीब ही हार गए है, तो उन्हे बदल कर चख लेता हूं। अब जब साथ ही छूट गए हैं, तो उन्हे भूल कर देख लेता हूं। अब जब अरमान ही अधूरे रह गए हैं, तो उन्हे पलट के देख लेता हूं। अब जब दिल के जख्म दिख गए हैं, तो उनके लहू से लिख लेता हूं। -मनीष कुमार टिंकू